“परम सत्यम धीमहि ऐसा कहते हुए महर्षि वाल्मीकि श्री हरि उनका धाम और उनकी कृतियों को सत्य मान लेने के लिए सबको प्रोत्साहित करते रहे; उस परम सत्य के धनी योगी महात्मा भी सत्य हैं और उनकी संगत को ही सत्संग माना गया। आचार्य कहते हैं सत्यम जगत तत्वतः। जगत में दार्शनिक लोग जिसे कभी कभी असत्य मान लेते हैं वह भी असल में सत्य ही है। भ्रम स्थल में जो “ज्ञान” का अधिष्ठान होता है उसे भी अपने भारतीय दर्शन और विधान चिंतन में सब प्रकार से सत्य मान लिया गया । कोई काठ के बने खंभे को देखकर यह भी कह सकता कि वह लकड़ी का है या खंभे में लकड़ी है या सिर्फ़ लकड़ी ही है; और कोई दिव्य दर्शी विज्ञान मनस्क व्यक्ति यह भी कह सकेगा कि खंभे में कार्बन हाइड्रोजन ओक्सीजन और नाइट्रोजन है ।.