KAVI KA GADYA


Delivery Options
Please enter pincode to check delivery time.
*COD & Shipping Charges may apply on certain items.
Review final details at checkout.

LOOKING TO PLACE A BULK ORDER?CLICK HERE

About The Book

इस पुस्तक में सभ्यता समाज साहित्य सिनेमा और रंगमंच से जुड़ी लेखक की चिंताएं शामिल हैं जो आलेखों-टिप्पणियों के रूप में समय-समय पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। इनमें एक ओर जहां उपलब्धियों और ऐश्वर्य की बदहवास एषणाओं के बीच मनुष्य का संवेदनहीन भीड़ में बदल जाने को लेकर गहरी चिंताएं और सरोकार व्यक्त हुए हैं वहीं इस भीड़ से अलग जीवन की जड़ों-संवेदनाओं की ओर वापस लौटने की नैसर्गिक विकलता और मानवीय कोशिशें भी दर्ज हैं।… सभ्यता ने हमें ज्यादा से ज्यादा आत्म-केंद्रित खुदगर्ज और संवेदनहीन बनने के अनेकविध उपाय भी सुझाए हैं। सूचना के विस्फोटक वैश्विक विस्तार के साथ ही हमारी सोच और संवेदना का दायरा संकुचित होता गया। एक तरफ जहां सारी दुनिया के दरवाजे हमारे लिए खुलने लगे तो दूसरी तरफ हमारी अपनी ही दुनिया सिकुड़ने लगी। हम बाह्य दुनिया से ज्यादा से ज्यादा जुड़ने की कोशिश में खुद से ही दूर होते गए। और आज हम भौतिक उपलब्धियों और ऐश्वर्य की बुनियाद पर संवेदना से खाली जीवन-दर्शन की तलाश में इतनी दूर निकल आए हैं कि जहां से जीवन के मूल स्रोतों की ओर वापस लौटना शायद आसान न हो।… बहुत सारी उपलब्धियां आज हमारे नाम हैं। पहाड़ों को चीरकर देश की सबसे लंबी सुरंग हमने बनाई सबसे लंबी गैस पाइपलाइन हमने बिछाई समुद्र पर सबसे लंबा पुल हमने बनाया सबसे तेज गति से चलने वाली बुलेट ट्रेन हमने चलाई। लेकिन आदमी केवल बाहर का पर्यावरण और भूगोल नहीं है उसके भीतर भी गोल-गोल एक दुनिया बसती है जहाँ वह अपनों-परायों के बीच रोज बढ़ती-घटती दूरियों और उठती-गिरती दीवारों के साथ रहता है। उसकी इस दुनिया को बचाने के लिए आखिर हमने क्या किया! लेखक की इन चिंताओं और सहज मानवीय सरोकारों के साथ हर संवेदनशील पाठक खुद को शामिल पाता है।
Piracy-free
Piracy-free
Assured Quality
Assured Quality
Secure Transactions
Secure Transactions
Fast Delivery
Fast Delivery
Sustainably Printed
Sustainably Printed
downArrow

Details