प्रत्येक काव्य-विधा का अपना अनुशासन और व्याकरण है। एक विधा की रचना दूसरी विधा के नाम से नहीं जानी जा सकती। जिस प्रकार भाषा को जीवित रखने के लिए व्याकरण की आवश्यकता होती है उसी प्रकार किसी काव्यविधा को जीवित रखने के लिए शिल्प-सम्बन्धी नियमों का पालन करना पड़ता है। पुस्तक में इन काव्य-विधाओं के बारे में आवश्यक जानकारी देने का प्रयास किया गया है।