यह कविता केवल शोक गीत नहीं है विलाप गीत नहीं है--- हां एक माँ की वेदना है इसलिए उसके दर्द से बिख रने और फिर अपने परिवार के लिए खुद को संभालने की कोशिशें भी हैं। किसी पल खुद को मजबूत कर समाज में सामान्य जीवन जीने की कोशिश करती माँ---अगले ही पल अपनी व्यथा में खुद भी अवसाद से ग्रस्त नजर आती है। बेटे के दुःऽ से टूटी हुई माँ का कभी परिवार के अन्य सदस्यों को िज़ंदगी से जोड़ने के लिए सामान्य होने का हौसला बढ़ता है तो कभी सारे प्रयासों से परे शून्य हो जाता है।---सुनीता पाठक
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