देश के कर्णधारों से उम्मीद रखी जाती है कि वे आदर्श स्थिति सामने रखेंगे लेकिन आज हालात ये हो गए हैं कि एक से बढ़कर एक टपोरी सामने आ रहे हैं। दूसरी बात यह भी कि शरीर की चमड़ी तो कुदरत ने जीव-जंतु की प्रकृति और उससे तादात्म्य स्थापित करने के लिए उसी के अनुरूप दी है लेकिन इंसान के शरीर की चमड़ी से ज्यादा उसकी आत्मा की खोल प्रभावित करती है जिसका चयन इंसान स्वयं करता है और यह खोल या कहें आत्मा की चमड़ी इतनी मुटा गई है बोथरा गई है कि उसपर संवेदनाओं सदाशयता भावनाओं का असर ही नहीं होता। संवेदनहीन आत्मा उसकी मोटी चमड़ी के बाहर आ भी नहीं पाती! और ऐसे में प्रश्न यह है कि व्यंग्यकार के कटाक्ष उस आत्मा की खोल या मुटा गई चमड़ी को भेद पाते हैं या नहीं! इसका अनुमान लगाकर उत्तर खोजना भी कठिन होता जा रहा है। और यही सब देख सुन कर यथास्थिति वादी लोगों की ओर से यह आवाज सुनाई देती है कि विसंगतियों दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध आक्रोश प्रकट करना खाली-पीली बकवास ही तो है। ऐसे में यह निर्णय तो पाठकों को ही करना होगा क्योंकि वे इस लिखे से उद्वेलित होते हैं या फिर उन्हें भी लगता है कि जो लिखा जा रहा है वह खाली पीली बकवास ही है। और इसीलिए निर्णय भी पाठकों पर छोड़ते हुए अपनी पुस्तक का शीर्षक अपनी पुस्तक में सम्मिलित एक व्यंग्य आलेख के शीर्षक ‘खाली पीली बकवास’ को ही उपयुक्त समझकर दे रहा हूं।