*खेलत गेंद गिरे यमुना में*उषा जी की कहानियों को पढ़ते वक्त कभी नागार्जुन तो कभी रेणु की याद आती है। इनकी कहानियां एक परंपरा के तहत चलती है। बिहार के अंचल की इनकी महिला पात्र पंजाब की पात्रों से ज्यादा कद्दावर हैं जो जीवन से जूझती है। इनकी रचनाएं स्त्रियों का जयघोष हैं। उनकी रचनाओं का कोई पश्चिमीकरण नहीं हुआ है। ये सामान्य स्त्रियों की कहानियाँ है जो जिंदा रह पाने के उपाय ढूंढती हैं। जो करती हैं खुल्लम-खुल्ला करती हैं। ग्लोबेलाईजेशन के युग में रचनाएं देशी कहानियाँ कह रही हैं या विदेशी ये पता नहीं चलता वहीं इनकी रचनाएँ एक संस्कार के तहत माटी के सुगंध से सराबोर करती है। -ममता कालिया