कहानियों में मार्मिकता तथा समाज का घिनौना रूप बिलकुल वैसे ही हैं जैसे दिन रौशनी और अँधेरा साथ-साथ लिए रहता है। एक युवक जो सोने (स्वर्ण) की लालसा में जब सारी दुनिया सो रही होती है तब सोने (नींद) के बजाय अपने सुनहरे सपनों की लालसा में जाग कर सोने (स्वर्ण) के लिए जाता है और सोने (स्वर्ण) से भरा मटका लिए घर लौटते हुए न सोने (नींद) के कारण गिरकर धाराशायी हो जाता है। सत्ता और प्रभुत्व में लिप्त व्यक्ति यदि घोर पाप भी कर जाएँ तो समाज को फर्क नही पड़ता पर कमज़ोर व्यक्ति ग़लत न भी हो फिर भी समाज की नज़र में दोषी है और सजा का हक़दार भी। धर्म को जब जीवन यापन का सहारा बना लिया एक दूकानदार ने तो सत्ता के सेवकों ने माथा टेका। संतान की इच्छा हर वर्ग में होती है पर कुपुत्र संतान के बारे में सोचना भी भयावह है। प्रेमपत्र तो 80-90 के दशक में हर प्रेमी और प्रेमिका के जीवन में कभी सुखदाई रहे होंगे पर समय बीत जाने पर यादों के झरोखे अचानक सामने आ जाएँ तो कुछ पल के लिए जैसे जीवन ठहर जाता है। अतीत के सारे पन्ने फिर से पलटने लगते है कभी मुस्कराहट और कभी आँखों में नमी का सबब बन जाते हैं। जैसे एक माँ जो अपने बच्चे के जीवन के लिए बिलखती रहे और जैसे मुट्ठी से रेत फिसलती है ऐसे अपनी गोद में माँ के बच्चे का जीवन फिसलता जाए और मानवता शर्मसार हो रही हो।