: “ख़्वाब: ''अर्श से फ़र्श” एक ऐसी कविताओं की पुस्तक है जिसमें ख़्वाब बुने जाते हैं सहेज़े जाते हैं परवाह की जाती है लेकिन वक़्त बदलने पर वही ख़्वाब ''अर्श से फ़र्श की ओर रूख़ कर लेते हैं। ख़्वाब जब अपने चरम-चोटी पर होते हैं तब कायनात आती है ज़लज़ले आते हैं बारिश की बूँदें धीरे-धीरे चेहरें पर रंग छोड़ जाती हैं और जब ख़्वाब टूट जाते हैं बिखर जाते हैं तब ज़मीं भी पाताल में जा मिलती है। उसे याद आता है कि किस तरह खुशनवा पलों में ख़्वाब बड़े रोमानियत से भरे होते थे जहाँ कवि कहते है:- ''अर्श से फ़र्श तक कहाँ मिलते है फ़रिश्तें जोहरा-ज़बीं इश्क़ में कहाँ देखते हैं सीरतें। वाकई इश्क़ प्यार मोहब्बत जितने भी नाम है वफ़ा के सब के सब बेइंतहा सुकूँ देने वाले हैं। लेकिन जब हिज़्र की मार पड़ती है तो विरह-वेदना आ घेरती है जैसे कवि कहते है:- बिछड़ जाने के बाद किसका दिल लगा है मिलते नहीं ख़्वाबों में तो ढूँढते है हसरतें। बेवफ़ाई तन्हाई और जुदाई इंसान के दिल फेफड़ें और चेहरे की हँसी चुरा ले जाती हैं इंसान चाह कर भी किसी को अपना दर्द बयाँ नहीं कर पाता। इस पुस्तक के अंदर ग़ज़ल नज़्म रूबाई और शेरों-शायरी भरपूर मात्रा में पढ़ने को मिलेंगी। कवि का भी अपन ख़्वाब था लेकिन एक दिन हृदय-घात उसके ज़ेहन में छाए इश्क़ के नशे को उतार देता है उसको पता चलता है कि जिसको चाहो वो दर्द में तुम्हारे साथ ही नहीं है फिर किसकी उम्मीद करें? उसको याद आता है :- “यूँ फ़िराक में उसके और तो ज़्यादा क्या होता होगा यूँ ही मेरे गाल है गीले और गीले हो जाते होंगे। गाल गीले ही रहे लेकिन कोई सुध लेने वाला नहीं ये दुनिया ऐसे लगने लगे जैसे बंदगी साथ छोड़ने लगे। बाकि जब आप कविताएँ पढ़ेंगे तब आपको वास्तविक दर्द का एहसास होगा आप ख़ुद चारा-साज़ी बनने को मज़बूर हो जाओगे।