“मेरा इश्क तेरे हाथों की हथकड़ी नहीं और न ही मैं उस जेल का जेलर और न ही तुम कैदी” - गालिब बहुत ही अजीब दास्ताँ है इस किताब के नायक-नायिका की जिनकी पूरी कविताएँ खुद के प्रेम के उतार चढ़ाओ पर आधारित हैं कहीं न कहीं दोनों ने एक दूसरे पर अपनी-अपनी कविताओं को पिरोया है - मानो एक-दूसरे को दोनों खोजते फ़िर रहे हैं। दुनिया की ये सच्चाई है कहा जाता है कि सच्चा प्रेम कभी मुकम्मल नहीं होता है। मिल जाते हैं जो अजनबी लोग अनजान सफ़र में कभी-कभी वो ऐसी कहानियाँ लिख देते हैं जो सदा-सदा के लिए अमर हो जाती हैं जिन्हें भूलना चाहो तो भुलाई नहीं जाती हैं। कभी ये भी होता है कि ये अनजान लोग ही एक दूसरे की जिंदगी बन बैठते हैं। बेइन्तहाँ प्रेम में कभी वो मोड़ आता है कि प्रेम तो सच्चा होता है लेकिन वो अपने घर-परिवार समाज में अपनों की मर्यादा को ताक पर न लगाते हुए खुद के प्रेम को परवान पर न चढ़ने देते हैं बल्कि प्रेम को ही कुर्बान कर देते हैं इस किताब के नायक-नायिका ने भी कुछ ऐसा ही किया है।