इस संकलन में पूर्व प्रकाशित कविताओं के साथ मेरी दो दर्जन नवीन कविताएँ भी हैं। इस प्रकार मेरे यौवन से चौथेपन तक के रचनाकर्म और चिन्तन का लेखा-जोखा संक्षेप में ही सही इस पुस्तक में पाठकों को मिल जायेगा।<br>अपने यौवन और रचनाकर्म के उषाकाल में कभी एक मनस्थिति को मैंने अनगढ़ से शब्द दिये थे-<br>अपने आप क्षितिज का पर्दा<br>झट उठ जाये <br>मैं उस पार निकल जाऊँ<br>तो झट गिर जाये<br>क्या जानूँ उस पार मिलेंगे<br>या कि नहीं ये चाँद सितारे<br>कैसा मौसम कैसा जीवन<br>क्या कुछ होगा<br>लेकिन फिर भी<br>इस जग से तो<br>लाख गुना बेहतर ही होगा।
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