हर लिखने-पढ़ने वाले को इस बात की खुशी होती है कि उसकी रचनाओं की किताब छपे। जाहिर है मुझे भी हो रही है। मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं कि अपनी बात कहां से शुरू करूं? साहित्य में खासकर व्यंग्य लेखन से पत्रकारिता में आया और अब पत्रकारिता से साहित्य की ओर लौट रहा हूं। बात लौटने की करूं या आने की? तीन दशक पूर्व जब व्यंग्य के पितामह हरिशंकर परसाई एवं उनके समकालीन कमलेश्वररविन्द्र नाथ त्यागी शरद जोशी आदि मौजूद थे और उनकी कलम की धार से आकाश पर शब्द उभर रहे थे जिनसे प्रेरणा पाकर मैंने लिखना शुरू किया। प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं ने मेरी भोथरी कलम को भी महत्व दिया और मैं लिखता चला गया। फिर एक मोड़ आया और मैं सब कुछ छोड़ आया। सच्चाई का मोड़ हर एक के जीवन में आता है तब उसके सामने बित्ते भर का पेट और बलिश्त भर का परिवार सामने होता है। मैंने इसलिए चुना भी वही रास्ता जिससे सिर्फ पेट भर सकता था और किसी तरह परिवार पल सकता था। मैं किसी विभाग में बड़ा सरकारी अफसर हो सकता था मैं किसी चीज का बड़ा व्यापारी भी हो सकता था पर चुना मैंने कागज और कलम का रास्ता। इस रास्ते पर चलकर मैं प्रशंसक बहुत पाया पर शुभचिंतक कम।तीन दशक पूर्व नगर में साहित्यिक संस्थाएं भी कम थीं पर आज ढेरों हैं। मेरा ही वेबसाइट बदल गया था। इसमें बिलासा कला मंच ने मेरी प्रथम कृति शनिचरी मत जइयो का विमोचन कराया। अब वही दूसरे व्यंग्य-संग्रह कालर पकड़ संस्कृति को प्रकाशित करने जा रहा है। मंच के हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी कि वह पुस्तक बिकेगी या नहीं बिकेगी? इसकी चिंता किए बगैर इसका प्रकाशन कर रहा है। दूसरी बड़ी बात यह भी हुई कि मंच ने मेरे भीतर के सोए हुए व्यंग्य के कुंभकरण को जगा दिया है। इस संग्रह को प्रकाशित करने के लिए डॉक्टर सोमनाथ यादव संस्थापक बिलासा कला मंच बिलासपुर के प्रति आभार व्यक्त करता हूं। इस संग्रह की रचनाएं आपको गुदगुदाती हैं रुलाती हैं यह मैं नहीं कह सकता क्योंकि रचनाएं पुरानी है और युग नया। यह बात जरूर ढांढ़स बंधाती है कि परिस्थितियां वही हैं विकृतियां विद्रूपताएं वही हैं। सभी चीजें वही हैं पर उनकी टेकनीक बदल गई है। पत्र की प्रतीक्षा हर इंसान को रहती है मुझे भी रहेगी क्योंकि वही सुख-दुख के संवाहक बच गए हैं।