कृष्ण अपने अंतस में ही घूम रहे हैं...फिर संभलकर बोले देवियों आपका कोई दोष नहीं है...आप ठीक उसी प्रकार पवित्र हैं जैसे यहां आने से पहले थीं। एक स्त्री का सम्मान उसके हृदय की पवित्रता से है...उसकी योनि में उसकी पवित्रता खोजने वाला समाज पाखंडी है पतित है और मूर्ख है। तुम सभी हृदय से निर्मल हो तुम्हारे साथ अपराध हुआ है...तुम्हारी आंखों के बहते हुए आंसुओं ने तुम्हारे मन को और निर्मल किया है। पीडि़त अपने दर्द से खुद को निर्मल करता है...उसका निर्मल हृदय ही उसे वेदना ज्यादा देता है। अगर हृदय निर्मल नहीं हो तो उसे अपने साथ हुए अपराध का एहसास भी नहीं होगा। तुम सभी का हृदय निर्मल है सो तुम्हें खुद को अपराधी नहीं मानना चाहिए। तुम्हें इस संसार में ठीक वैसे ही जीवन जीने का अधिकार है जैसे दूसरी राजकुमारियां और स्त्रियां जी रही हैं। तुम अपना आने वाला कल चुनो बिना किसी भय पक्षपात और द्वेष के।