भाग्य पर इतराता मैं भाँति-भाँति से गाता था। मदमस्त ताल-तरंगों पर मैं झूम के रह जाता था। अब टीस सी उठ जाती है यौवनता की स्मृति में। वृद्धावस्था की भाँति उपेक्षित व्यवहार की वृत्ति में। प्यास बुझाने वाले भी विस्मृत हो रहते मद में। भूल गए वो मधुर-शीतलता जीवन रहता था जिसमें। अधूरे विकास की अंधी दौड़ ने मेरा ठौर बिगाड़ा है। भौतिकता की होड़ में आशियाना मेरा उजाड़ा है।