किसी समीक्षा या आलोचना के फ्रेमवर्क में रह कर लघुकथाओं की विवेचना नहीं की गई है। प्रत्येक रचना को ऽुले दिमाग से जिस तरह की विवेचना की जरूरत थी उसी के अनुसार की गयी है। एक बात जो सब में सामान्य है वह है कंटेन्ट यानी विषय वस्तु किसी भी रचना में यह सबसे महत्वपूर्ण होती है नए विषयों का अनुसंधान और प्रचिलित विषयों का अनोऽा प्रस्तुतीकरण आप इन रचनाओं में पाएंगे। शुरुआत तो अशोक भाटिया की लघुकथा फ्स्त्रियाँ कुछ नहीं करती!य् से हुई। जब मैंने इसे फेसबुक की पोस्ट के रूप में डाला तो प्रतिक्रिया काफी उत्साह जनक रही। इससे उत्साहित हो अपनी अन्य पसंदीदा रचनाओं की विवेचना करना आरंभ किया। बलराम अग्रवाल की फ्बिना नाल का घोड़ाय् मुझे विशेष पसंद थी अतः उस पर कलम आजमाइश की। रिजल्ट अच्छा रहा। विवेचना संतोषप्रद होने से क्रम को आगे बढ़ाया स्नेह गोस्वामी की फ्वह जो नहीं कहा गयाय् और हरभगवान चावला की फ्धरती में गड़ी स्त्रियाँय् की विवेचना तक आते-आते मेरा आत्म विश्वास बढ़ा। पाठकों के साथ रचनाकारों को भी विवेचना काफी पसंद आई। अतः मैंने इस क्रम को आगे बढ़ाया और एक पुस्तक का रूप देने की सोची। साल दो साल की मेहनत के बाद आज चालीस लघुकथाओं की विवेचना पुस्तक आपके सामने है। मेहनत इसलिए कह रहा हूँ कि कई दिनों तक एक रचना में रचे बसे रहना कम से कम तीन चार ड्राफ्रट के बाद उसे फाइनल करना मेहनत का ही काम था। इसी मेहनत का सुफल है यह पुस्तक। लघुकथाओं के लघु आकार ने यह संभव बनाया है कि रचना के साथ उसकी समीक्षा प्रस्तुत की जा सके। इससे पाठक को पूरी संतुष्टि मिलती है। यह कहानी और उपन्यास में सम्भव नहीं है।
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