*लौट आ बचपन* कभी ना कभी कहीं ना कहीं हम सब ये जरूर कहते है कि लौट आ बचपन पर क्या ऐसा हो सकता है ? जवाब है नहीं ! उन्हीं बचपन कि यादों को इस किताब में कई सह लेखक - लेखिकाओं ने अपनी रचनाओं के जरिए दोहराने का प्रयास किया है । तो चलिए हम लौट चलते है उन बचपन कि गलियों में उन यादों में उस बेफिक्र भरी ज़िन्दगी में ।आप सभी इस किताब को पढ़कर एक बार फिर अपने बचपन में लौट जाएंगे ।