मुझे वो दिन आज भी याद हैंजब पहली बार लॉकडाउन का ऐलान हुआ था । किसी ने सोचा भी नही था कि हमारी दिनचर्या एक दम से रुक जाएगी।मार्च महीने की बात थी जब लॉकडाउन लगा था तो उसके बाद से सभी मानव जाति एक समान हों गए। गरीब हो या अमीर सभी के लिए एक समान नियम कानून थे। पूरे विश्व में कोरोना को लेकर कोहराम मचा हुआ था । ऐसा नहीं हैं कि इस से पहले मानव जाति को नुकसान पहुंचाने के लिए की दुनिया में महामारी नही आई थीं ।कोरोना से पहले भी कई महामारी आई और उस पर जीत भी हुई । पूरा विश्व अर्थव्यवस्था की मार झेल रहा था।लॉकडाउन में वैसे तो सभी के लिए घर चलाना मुश्किल ही था लेकिन सबसे ज्यादा प्रभाव प्रवासी मजदूर परा ।अपने घर से दूर अनजान शहर में जाकर मजदूरी करना कोई आसान काम नहीं हैं। लॉकडाउन और प्रवासी मजदूर रू इस पुस्तक में लॉकडाउन के दिनो में बिताए गए पलो को याद किया गया हैं।और दिल्ली से कैसे एक प्रवासी मजदूर अपना कुछ सामान बांधे इन विकट परिस्थितियों में भी अपने परिवार से मिलने पैदल ही बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में आता हैं।न जानें रास्ते में वे कितने मुश्किल घड़ियों का सामना किया होगा। मेरी यह पुस्तक उन सभी प्रवासी मजदूर को समर्पित हैं जो इस कोरोना के समय में मुश्किल परिस्थितियों का सामना किए ।