कविता वैसे तो हृदय के अंतस से ध्वनित होकर मस्तिष्क में पहुँचती है और फिर कवि उसे काग़ज़ पर उतार लेता है। लेकिन हृदय का अंतस भी तभी जागृत होता है जब उसे झंकृत करने वाला कोई प्रेमी या प्रेयसी हो। फिर तो कविताएँ स्वयं ही बनने लगती हैं। कवि रोहित कुमार की काव्य-रचना इसी केंद्रबिंदु को पकड़े हुए आगे बढ़ती है और वह स्वीकारते हैं कि कविताएँ लिखना तो उनके लिए बहाना भर है दरअसल यह तो एक प्रेम पत्र है जिसे उन्होंने कविताओं का रूप दे दिया है। कवि का प्रेम पत्र ही अब ‘लव लेटर’ के रूप में पुस्तकाकार है और रोहित चाहते हैं कि यह प्रेम पत्र उनकी प्रेयसी तक पहुँच जाए।