अकेलापन एक शाश्वत अनुभव है। जब प्रयाण के तीसरे चरण में पहुँच जाते हैं तो प्यार के प्रति संवेदना पहले जैसी नहीं होती। समय जीवन को पीछे छोडता चला जाता है। प्यार के प्रति संवेदना हमेशा एक जैसी नहीं होती। कभी-कभी सुबह भी रूठी लगती है। दिन-रात की तो बात ही निराली है। इसलिये इतिहास कुरेद कर हम कुछ बीते आयाम जी लेते हैं। साथ रहना और साथ जीना दोनों की परिभाषा बहुत अलग है। ‘मधुबाला’ समय को बाँधने का एक प्रयास है। इस संकलन में अन्य रचनाएँ भी हैं जो जीवन के बहुत पास हैं।