व्यक्गित रूप से शहर लाहौर से मेरा सिर्फ लगाव ही नही एक अटूट रिश्ता भी है। यद्यपि हमारा पैतृक गांव फगवाड़ा शहर से नवांशहर सड़क पर स्थित दोआबा क्षेत्र में ‘मल्लूपोता’ है लेकिन मेरे पिताश्री ने लौहार में डाक्टरी की शिक्षा प्राप्त की। नौकरी उन्होने लाहौर के आसपास की और मेरा जन्म ‘गग्गो मंडी’ में हुआ जहां के सरकारी हस्पताल में वह नियुत्तफ़ थे। देश विभाजन से पूर्व लगभग दस वर्ष की आयु तक अपने नन्हे नन्हें पावों से उत्सक मन से स्तब्ध और धड़कते दिल से अपने पिता की उंगली पकड़ कर लाहौर को देने इसे महसूस करने और इसकी अधिली मासूम यादों को सहेजने के सुअवसर मुझे प्राप्त हुए। हिन्दुस्तान विभाजित होकर ‘भारत और पाकिस्तान हो गया और हम भारत में पैतृक घर आ गए लेकिन अपना वह घर कभी नहीं भूले जहां हमारा जन्म हुआ। जहां हमारे कदमों ने नन्हे-नन्हे डग भरने सी और जहॉ की मासूम यादें हमारे मन मस्तिष्क में धड़कन और सपने बनकर समाई रहीं। यहां अपने घर रहते हुए भी वहां के घर को हम भूल नही पायें।