यह पुस्तक एक दार्शनिक है। हम सब जीवात्मा जब यह तन धारण कर इस संसार में आते हैं तब बड़े शुद्ध होते हैं। न तन पर कोई मैल होती है न ही मन पर। किंतु समय के साथ-साथ सभी प्रकार के विकारों से भरते-भरते यह तन और मन दोनों मैला हो जाते हैं। मन की उलझनों को सुलझाने की एक कड़ी लेकर प्रस्तुत है यह पुस्तक ‘मैली चादर”