मन मधुकर खेलत वसन्त :जब हम ओशो के साहित्य को देखते है तो चमत्कृत रह जाते हैं क्योंकि उसमें चैतन्य है इसीलिए हमें चमत्कार लगता है। हमें लगता है कि हममें भी अभी प्राण है। उस चेतना की प्रखर लहर पर बहाते हुए वे हम ले जाते हैं यही उनका जादू है। -डॉ. बलदेव वंशीध्यान और प्रेम :प्रेम बिलकुल अनूठी बात है उसका बुद्धि से कोई संबंध नहीं है। प्रेम का विचार से कोई संबंध नहीं। जैसा ध्यान निर्विचार है वैसा ही प्रेम निर्विचार है। और जैसे ध्यान बुद्धि से नहीं सम्हाला जा सकता वैसे ही प्रेम भी बुद्धि से नहीं सम्हाला जा सकता। ध्यान और प्रेम करीब-करीब एक ही अनुभव के दो नाम हैं।