सनातन धर्म ग्रन्थों के अनुसार ईश्वर ब्रह्माण्ड को त्रिमूर्ति (ब्रह्मा विष्णु और महेश) के रूप में संचालित करते हैं। ब्रह्माण्ड के १४ लोकों में एक पृथ्वी लोक है जिसे मृत्यु-लोक कहा जाता है। पृथ्वी में थल जल वायु आकाश और अग्नि पंच तत्व हैं। यही हमारी सृष्टि है। भगवान गीता में स्वयं अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते हैं- मैं ही ईश्वर हूँ। मैं ब्रह्माण्ड की व्यवस्था को संचालित करने के लिये अवतार लेता हूँ। जब-जब पृथ्वी पर धर्म की हानि होती है और अधर्म का उदय होता है तब-तब मैं धर्म की रक्षा करने और अधर्म का नाश करने के लिये विभिन्न प्राणियों की देह के रूप में स्वयं पृथ्वी पर अवतरित होता हूँ।श्रीमद्भगवत् पुराण में भगवान के २२ अवतार बतलाये गये हैं। कुछ धर्म शास्त्रों में २४ अवतारों का वर्णन है। गरुण पुराण के अनुसार भगवान् के दस अवतार हैं- मत्स्य कूर्म वराह नरसिंह वामन परशुराम राम कृष्ण बुद्ध और कल्कि। इनमें से 'भगवान के ९ अवतार हो चुके हैं। कल्कि अवतार का कलियुग में होना बतलाया गया है।त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम श्रीहरि के सातवें अवतार थे। आदि कवि श्री वाल्मीकि जी और तुलसीदास जी ने रामकथा का रामायण व रामचरितमानस में विस्तार से वर्णन किया है। प्रस्तुत पुस्तक में रामचरितमानस की ही चर्चा की गयी है।
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