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About The Book
Description
Author
मानव संरचना में अस्थि-पिंजर और काया के बीच कहीं छिपा हुआ है मन। यह बहुत कोमल चंचल विस्तृत और निराकार है। दिखता नहीं है किन्तु बहुत कुछ कहता सुनता और समझता है। हठीला भी है इसलिए कभी निर्लज्ज भी हो जाता है। जैसा भी हो मन जीवन के साथ सदैव जुड़ा रहता है और सारे आभासों को अपने पिटारे मे भरता जाता है। यही मंजूषा है-हमारी संपत्ति है। इस पिटारे में सुख-दुख स्नेह-सगाई विरह-वेदना आमोद-प्रमोद जैसे कई तरह के आभास बंद हैं। जब समय मिले उसे खोल कर झाँक लें तो बंद नहीं कर पायेंगे क्योंकि उसमें जीवन दिखता है। इस मंजूषा मे 110 रचनाएँ हैं जो जीवन के आस-पास हैं। आइये इसे साथ मिल कर खोलें...