विद्यार्थी जीवनकाल में पाठड्ढक्रम में शामिल संत कबीरदास गोस्वामी तुलसीदास रहीम महाकवि बिहारी आदि के दोहों को पढ़ने का सौभाग्य मिला। उसी समय से ही लयबद्ध करके गाये जाने वाले इस छंद के प्रति विशेष आकर्षण पैदा हुआ जो आज पर्यंत कायम है। इस आकर्षण के वशीभूत होकर स्कूली अध्ययन के समय में ही दोहा सृजन करने का प्रयास करता रहा किंतु वे अनगढ़ होथे थे। ये दोहे शिल्प व भाव के दृष्टि से कमजोर थे क्योंकि मात्र गणना विधान का सही ज्ञान नहीं था न ही विचारों को ठीक से बाँधना आता था। आगे चलकर उच्च अध्ययन के दौरान व शिक्षकीय पेशा में आ जाने से छंदो के बारे में जानने-समझने विशेषकर दोहा के बारीकियों को आत्मसात कर पाना संभव हो पाया। फलस्वरूप दोहा सहित विविध छंदों में कलम चलने लगी।
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