MANZAR GAWAH HAIN


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About The Book

ये कविताएं उन ख़यालों का आईना है जो रोज़मर्रा की ज़िंदगी से रूबरू होते हुए उठे । कभी किसी अख़्ाबार के पन्नों को देखकरए कभी किसी के व्यवहार को देखकर या कभी यूं ही अकेलेपन में । राजनैतिक घटनाएँए सामाजिक परिवेशए अच्छी–बुरी व्यवस्थाएं और पारिवारिक उतराव–चढ़ावए सभी ने अपने–अपने ढंग से इन कविताओं में अपनी जगह बनाई है । साथ हीए मेरे कुछ अपने दर्दए कुछ भावनाएँ और कुछ एहसास भी उनमें चाहे–अनचाहे शामिल होते चले गए । कुछ ग़ज़ल बन गएए कुछ गीतए तो कुछ मुक्तक और कुछ ने ऐसा रंग–रूप ले लिया जिनको कोई परंपरागत नाम ही न दिया जा सके । बस जो आयाए जैसे बन पड़ा वैसा ही लिख दिया । कोशिश रही कि प्रवाह न थमे । मेरे एक पारखी मित्र ने कहा कि ये कविताएं नहींए अभिव्यक्ति हैं । मुझे भी लगता है कि शायद यही ठीक परिभाषा होगी इन रचनाओं की ।
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