मैं जनवादी लेखक होकर भी गैर-जनवादी रचनाओं से परहेज नहीं कर पाता। मैं उन्हें भी समाज का अंग मानता हूँ। मैं नहीं चाहता कि कोई पंथ मनचाहा मोड़ देकर उन्हें जीवन-समाज से गायब कर दें? मेरा प्रयास गलीज कहानियों से भी पोजिटिव संवाद निकालने का रहा। प्रायः मेरी कहानियाँ सत्य के धरातल पर ‘स्वांतः सुखाय’ के लिए ही होती हैं। मैं कहानियों के माध्यम से समाज और व्यक्ति में सुधार होने की मंशा रखता हूँ बदलाव कर देने का दावा नहीं क्योंकि यहाँ की जनता धर्म-जाति की जकड़न से पूरी तरह मुक्त नहीं है। बहाव में बहने वाली है। उनमें राजनैतिक और वैज्ञानिक सोच न होकर वह परंपरा के संरक्षक है। -ललन तिवारी