इसमें अब कोई सन्देह नहीं रह गया कि भारत का पॉपुलर मीडिया खासतौर से टीवी अब वह बिलकुल नहीं कर रहा है जिसकी अपेक्षा हम एक लोकतांत्रिक देश होने के नाते उससे करते हैं। वह कुछ और कर रहा है और इतने साफ़ ढंग से कर रहा है कि यह भी बिना कोशिश के दिख जाता है कि क्या कर रहा है! लेकिन देश का हर दर्शक इसे नहीं देख पाता; हमारी जनसंख्या का वह बड़ा हिस्सा जिसे साक्षर होने के बावजूद शिक्षित नहीं कहा जा सकता जिसे अपनी समझ का परिष्कार करने के लिए अभी और समय चाहिए था अधबीच ही उस गोरखधंधे के हत्थे चढ़ गया है जिसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विज्ञापन और पीआर एजेंसियों भाषा के जादूगर विज्ञापन लेखकों फ़ेक न्यूज़ की फैक्ट्रियों सच्ची- झूठी समाचार संस्थाओं और सोशल मीडिया के सहारे चला रहा है। दर्शक देशवासियों का यह विशाल हिस्सा आज भी मुद्रित और प्रसारित छवियों/शब्दों को लगभग देववाणी मान लेता है इसलिए वह मीडिया के उस प्रचार का बहुत आसान शिकार हो जा रहा है जो प्रचार जो नैरेटिव न तो उसका है और न उसके हित में है जिसका उद्देश्य नागरिक को महत अपने काम की चीज बनाना है। प्रखर मीडिया विश्लेषक और माध्यमों की लोकतांत्रिकता के प्रति गहरे चिन्तित विनीत कुमार की लम्बे समय से प्रतीक्षित यह किताब मीडिया के मौजूदा इस संजाल को अपेक्षित तथ्यों आँकड़ों सन्दर्भों विवरणों और विश्लेषणों से रेशा- रेशा खोल देती है। इस किताब को पढ़ना आज हर उस व्यक्ति के लिए जरूरी है जिसे देश देश के लोगों और लोकतंत्र की सचमुच में चिन्ता है।