शरद चंद देवस्थले की यह किताब फिल्मों के दीवाने की किताब है जिसे बचपन से ही फिल्में देखने का शौक था। फिल्मों को लेकर दीवानगी होती ही ऐसी है खास तौर पर हिंदी फिल्मों की जिसमें हमारे समाज के तमाम किरदारों के साथ उनकी भावनाएँ दिखाई देती हैं। ये भावनाएँ गीतों में ढलकर इंसानी एहसास को एक अलग ही रंग से परिचय कराती हैं। शरद चंद देवस्थले ने भी इन्हीं रंगों में खुद को डूबा हुआ पाया और बचपन से लेकर उम्र के एक अच्छे-भले पड़ाव तक के फिल्मी अनुभवों को दर्ज करना शुरू किया। सोशल मीडिया पर फिल्मों उनके किरदारों कहानियों नायक-नायिकाओं विेलन आदि से लेकर उसके गीत-संगीत पक्ष की समीक्षाएँ लिखने का जो सिलसिला शुरू हुआ तो वह ‘मेरा फिल्मी सफरनामा’ नामक इस किताब पर आकर भी खत्म नहीं हुआ और फिल्मों को लेकर उनकी टीका-टिप्पणियाँ आज भी बदस्तूर जारी है। यह किताब शरद चंद देवस्थले के फिल्मी ज्ञान और फिल्मी सफर का एक अनूठा दस्तावेज है।.
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