गाँव भारतीय समाज का केन्द्रीय आधार है जहाँ सामूहिकता और भावनात्मक जुड़ाव दैनिक जीवन का विश्वास और व्यवहार है। किन्तु जब कुछ बाहरी राजनीतिक-अर्थव्यवस्थाएँ आधुनिकता की शक्ति से ग्राम समाज की सामूहिकता को बदलने का प्रयास करती हैं तो संकट शुरू हो जाता है और गाँव अपना अस्तित्व खो देता है। यह कथा-कथन आधारित पुस्तक सामूहिक-स्थायी मानव जीवन के लिए महात्मा गाँधी के समाजशास्त्रीय दर्शन पर बल देती है।
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