इस उपन्यास के लेखन काल में सीता के चरित्र पर चिंतन करते हुए लेखक के सामने कई परिदृश्य थे - जैसे सीता का जन्म बाल्यकाल शिक्षा और राजा जनक जैसे विद्वान कृषि-प्रेमी की पुत्री होने के कारण व्यक्तित्व विकास। लेखक को नहीं लगता था कि ऐसे संस्कारों को साथ लेकर आई राजकुमारी अवध में निष्क्रिय सुख-भोग्या वधू बन जाएगी। सीता अवध के सामाजिक जीवन में अपने अनुभव और कार्यकुशलता के माध्यम से स्त्रियों को शिक्षित और जागृत और आत्मनिर्भर बना कर उनकी पारिवारिक आय में वृद्धि का सुखकर अध्याय जोड़ती है जिसके परिणाम-स्वरूप अवध साम्राज्य का बहुआयामी विकास होता है। इतना ही नहीं वह अवध के राजा दशरथ की उपेक्षित उप-पत्नियों की देखभाल और सेवा-शुश्रूषा का क्रांतिकारी कार्य भी करती है। ---अनिता कुमार
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