धरती के गर्भ से निकले क़ीमती हीरों से भी महँगे क़िस्सों में से एक क़िस्सा है― ‘मूमल-महेन्द्रा’। थार के रेगिस्तान की सूनी तिड़कती तपती धरती पर होने वाली बारिश से उपजी महक-सा है इनका प्रेम। अभावों से भरी इस धरती में पनपते रोहिड़े के फूलों जैसी कोमलता और रूप-स्वरूप लिए है इनकी प्रेम कहानी। यहाँ की हाड़-जमाऊ सर्दी में किसी अलाव से आती आँच लिए है इनकी प्रेम कहानी। यहाँ की तन-जलाऊ अगन के अंगारे लिए लू में धू-धूकर जलती तड़पती बिलखती हुई है इनकी प्रेम कहानी।सदियों से ज़िंदा यह क़िस्सा है लुद्रवा (जैसलमेर) की मूमल और उमरकोट (पाकिस्तान) के महेन्द्रा का एक रूप-जोबन और बुद्धि से भरी तो दूसरा जवानी साहस और वीरता से भरा। वैसे तो अतीत का क़िस्सा है लेकिन मूमल की मेड़ी और उमरकोट के बीच आज भी भटक रहा है। जैसे आग उगलते इस रेगिस्तान में तड़पती सिसकती बलती उनकी आत्माएँ आज भी फड़फड़ा रही हों। इस क़िस्से के साथ है बरसों से उजाड़ अभावों में भी आस जोश और अपणायत के भाव लिए इस मरुभूमि की संस्कृति-सभ्यता सुख-दुःख पीड़ा-करुणा...
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