Mrigtrishna - 2


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About The Book

ये उन सर्दियों की कहानी है जब दस वर्षीय प्रथम की कल्पना की पतंग की डोर उससे छूट जाती है और उसकी कल्पना अब उसके सपनो में उँड़लने लगती है। ये उन सर्दियों की बात है जब प्रथम के दादाजी का देहांत हो जाता है और उनके घर में प्रथम का बड़ा सा परिवार जमा होता है। ये उन तेरह दिनों की बात है जब छोटे बच्चे भूतों की कहानियों से और बड़े लोग उखड़ी सी बातों से अपना मन बहलाते हैं। प्रथम के दादाजी की विरासत में हैं कुछ ज्ञान की बातें पीछे बाड़े में पड़ा कुछ सामान और उनके सपने उन्हें रातों में नींद में आने वाले सपने। कहते हैं के जब कोई गुज़र जाता है तो उनकी आत्मा को परलोक पहुँचने में करीब तेरह दिन लगते हैं उन तेरह दिनों में उस बेघर आत्मा का घर बन जाते हैं किसी अपने के सपने प्रथम के सपने।
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