मृष्ट राज्य के शिवाला पर्वत के मध्य भाग में स्थित एक गुफा में जब चक्रांक की आंखें खुलीं तो कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का सूर्याेदय हो चुका था। मृष्ट राज्य की प्रकृति उसे सुकून दे रही थी मगर रोते-तड़पते लोगों के शाप का स्मरण होते ही वह व्यथित हो उठा। नीचे आकर मृष्ट राज्य की वादियों में झील किनारे जब उसे चंदिका के दर्शन हुए तो एक अद्भुत आनंद की अनुभूति हुई किंतु शीघ्र ही मानो किसी भीषण रक्तपात के दृश्य ने चक्रांक को पुन: चारों ओर से घेर लिया। पुंगव नगर से इधर उधर भटकता चक्रांक मृष्ट राज्य के कई नगरों से गु़जरा। कभी शरणार्थियों के शिविर में रुका कभी खंडहर में तो कभी सशुल्क सराँय में। मगर जब वह वापस पुंगव नगर लौटा तो वो अकेला नहीं था उसके साथ एक चमत्कार भी लौटा था। हिस्सा बनें वादियों से गु़जरती एक चमत्कारी कथा का।
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