प्यार की यह पीड़ादायी कथा आधुनिक महानगरीय परिवार की कहानी भी है समाज की भी; ख़ासतौर से जब वह सिर्फ़ भीड़ होकर व्यक्तियों की संवेदनाओं से खेलने लगता है और वयस्कों की कामनाओं के भँवर में डोलते बच्चों की भी। इक्कीसवीं सदी के हमारे आज में संक्रमण के प्रवाह में नए और पुराने की मुठभेड़ों से पैदा हुई घातक पीड़ा इस उपन्यास के पन्ने-पन्ने पर दर्ज है। एक सुसम्पादित फ़िल्म की तरह सजीव दृश्यों संवादों और वातावरण की सूक्ष्म रेखाओं से बुना यह उपन्यास जो सबसे पहले करता है वह प्रेम के इर्द-गिर्द लिपटे इस दुख और पीड़ा को हम तक पहुँचाना है। साथ ही हमें चेताता भी चलता है कि यह दुख हमारी नियति के साथ बँधा है इसका उपचार नहीं है। यह हमारे होने की जद्दोजहद का हिस्सा है। बस कोशिश यह रहे कि हम उसे ईमानदारी से निबाहें; कपट चालाकी और मौक़ापरस्ती का अवकाश न प्यार में है न पीड़ा में। यह नैतिकता-अनैतिकता के ढाँचों को तहस-नहस करते बेचैन शहरी जीवन के अकेले कोनों और जकड़न की कहानी भी है और वयस्कों के जीवन में आई तबाहियों से बच्चों पर पड़ने वाले असर की भी। यहाँ बच्चों के नज़रिये से वयस्कों की दुनिया को देखने-समझने की कोशिश है और उसके कारण उनके मन में होती उथल-पुथल की पड़ताल भी है। कम उम्र में उनके सामने स्वार्थ और धोखों की ऐसी दुनिया खुलती है जिससे बचना चाहते हुए भी वे जा टकराते हैं। यह भीतर के अँधेरों और अपने रहस्यों से जूझते व्यक्तियों की कहानी भी है।