प्रेम पर्व के 40 सॉनेटस प्रेम के कई रंगों से अंकित हुए हैं प्रेम के भिन्न भिन्न मनोभावों से कल्पित हैं। प्रेम में विरह का स्थान भी अनन्य है पीड़ा भी सौंदर्य से परिपूर्ण हो जाती हैं.. क्योंकि प्रेम का आवरण रूप परिवर्तन तो करता है किंतु भावनाएँ जो परम विह्वलता में थीं.. वही भावनाएँ सुखद क्षणों की अश्रु में रूपांतरित होकर चिबुक पर उष्म स्पर्श देते हुए हृदय पर्यंत पहुँच जातीं हैं। अतः पीड़ा का एक अद्भुत पर्व समस्त ऋतुओं को एकत्रित कर प्रबल भावावेग में अतिवाहित होता है। द्वितीय भाग में पीड़ा पर्व के 20 सॉनेट्स समस्त पीड़ाओं का उल्लसित क्षण है। इस पीड़ा का अंत पीड़ा से न होकर शाश्वत भाव से प्रतिलंबित होता रहता है। मृत्यु एक अंत नहीं.. जीवन का प्रवाह है.. प्राचीन से अर्वाचीन पर्यंत की यात्रा है। तथापि शोक सिक्त कई शरीर प्राणपुष्प की लोभनीय मधुरिमा से विमोहित होकर यात्री की यात्रा को वाधित करते हैं। पीड़ा उत्सव की संपूर्णता है मृत्यु उत्सव। कथित पुस्तक के तृतीय भाग में मृत्यु एक कलिका के रूप में सम्पूर्ण यात्रा को पल्लवित कर रही है। यह वह कलिका है... जब वह विकसित होती है तो समस्त स्मृतियों की सुगंध महाशून्य में स्तीर्ण हो जाती है... यह एक संपूर्ण विराम का अस्तित्व है। यह वह क्षण है जो केवल यात्रा मार्ग को सुगंधित एवं प्रफुल्लित रखता है।
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