मौमिता को पढ़ते हुए मुझे हमेशा कमला दास का ख़्याल आता है। और यह बेजा ख़्याल नहीं है। वैसा ही विद्रोह वैसा ही संशय वैसे ही आरक्षितता वैसे ही खरापन और निर्भीकता। अपने भाव संसार और अनुभव जगत में वे सचमुच समकालीन हैं। -असद ज़ैदी मुझे नहीं पता कि मौमिता की कविताओं का अनुवाद करते हुए मैं उसका सार कितना बचा पाई कितना उड़ा दिया। लेकिन सच तो यह है कि अनुवाद करते हुए खुद मौमिता मेरे शब्द बन गईं। हम खयाल तो वह पहले से ही थीं। हमनवां बन गईं! -अमिता शीरीं लेखक जेम्स बाल्डविन से शब्द उधार लेकर कहें तो मौमिता की कविताएं कोई उत्तर नहीं देती बल्कि उनकी कविताएं ठंडे उत्तरों के पीछे खौलते सवालों को हमारे सामने लाती हैं। -मनीष आज़ाद
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