जब-जब विचारशील मस्तिष्क संवेदित हृदय और परिष्कृत चेतना खण्डित होने लगती है तब-तब एक स्त्रीत्व के मन में 'मुझे भी पढ़ो न' की ध्वनि कम्पित होने लगती है। 'मुझे भी पढ़ो न' काव्य संग्रह में स्वरों और अन्तस्थ भावनाओं को शब्दों की माला में शिल्प सौन्दर्य के साथ पिरोने का अल्पांश प्रयास किया है जिसमें जीवन मूल्यों के साथ प्रेम त्याग समर्पण और स्वाभिमान के बीज भी अंकुरित होंगे। जो भविष्य में दिशा बोध की ओर प्रखर तर्क भी उत्पन्न करेंगे। प्रिये पाठकों के लिए आशा और विश्वास के साथ प्रस्तुत है।