... ‘‘माइ पापा इज़ ग्रेट‘‘ मेरा तीसरा उपन्यास है। लेकिन मेरा ये उपन्यास मेरे पिछले दोनोंे उपन्यासों से बिल्कुल मुख़्तलिफ़ मौज़ू पे है और उम्मीद है यह भी मेरे पाठकों को बेहद पसंद आएगा और वे अपनी मुहब्बतों से मुझे नवाज़ेंगे। ये एक बाप-बेटी के दरमियां बेहद भावुक रिश्ते पर आधरित उपन्यास है और बाप-बेटी का यह रिश्ता यहाँ तब मुखर होकर सामने आता है जब पति-पत्नी के रिश्ते में दूरियां आती हैं और पत्नी अपने पन्द्रह साल के वैवाहिक रिश्ते को दरकिनार कर विलासितापूर्ण ज़िन्दगी जीने की ख़ातिर अपने अरबपति प्रेमी के साथ चली जाती है और तब बेटी सहारादेती है अपने बाप के लरज़ते दामन को। बेटी को ये महसूस होता है कि उसका बाप ख़ुद्दार है और संवेदना से भरा हुआ है। जिस तरह कांच के सामान के डब्बे पे लिखा होता है ‘‘हैंड्ल विद केयर‘‘ ठीक वही बात इस्तेमाल होती है इनसानी रिश्तों की बाबत भी। रिश्ता चाहे जैसे भी हों बड़े नर्म-ओ-नाज़्ाुक होते हैं और जिसने भी इसकी नज़ाकत को समझा वो रिश्तों को संभाल कर रखता है और उसे बख़ूबी निभा ले जाता है। नही ंतो बारीक़ डोर से बंधे रिश्ते को बिखरने में ज़रा भी वक़्त नहीं लगता और ख़ासकर रिश्ता पति-पत्नी का हो तो और भी ज़रूरत है इसकी नज़ाकत को शिद्दत से महसूस करने की और इसे सींचने की मुहब्बत से.....ख़ुलूस से और हस्सास से लैस समझदारी से।....