नव-निधि – प्रेमचन्द की नौ अमूल्य कहानियाँ प्रेमचन्द का कहानी–संग्रह नव-निधि (1948) मानवीय जीवन के नैतिक सामाजिक और भावनात्मक द्वंद्वों का सजीव चित्र है। सरल भाषा सधी हुई कथावस्तु और गहरी संवेदना—यही इसकी पहचान है। संग्रह में सम्मिलित नौ कहानियाँ: 1. राजा हरदौल – त्याग और मर्यादा की गौरवगाथा लोककथा-सी धड़कन के साथ। 2. रानी सारन्धा – वीरता निष्ठा और स्त्री–सम्मान का प्रेरक चित्रण। 3. मर्यादा की वेदी – रिश्तों में ‘धर्म’ बनाम ‘कर्तव्य’ का कठोर प्रश्न। 4. पाप का अग्निकुण्ड – अपराध-बोध और आत्मशुद्धि की ज्वाला में तपता मन। 5. जुगुनू की चमक – अँधेरे वक्त में आशा की छोटी पर मार्गदर्शक रोशनी। 6. धोखा – स्वार्थ भ्रम और विश्वासघात की पेचीदगियाँ। 7. अमावस्या की रात्रि – भय अंधविश्वास और मनोवैज्ञानिक तनाव का मार्मिक रेखांकन। 8. ममता – मातृत्व की निस्वार्थ छाया और उसकी नैतिक परीक्षा। 9. पछतावा – गलती के बाद जागी अंतरात्मा की कचोट और मुक्ति की चाह। नव-निधि में प्रेमचन्द आम जन की पीड़ा ईमानदारी संघर्ष और मानवीय करुणा को इतने सच्चे यथार्थ से उकेरते हैं कि कथाएँ पढ़कर देर तक मन में गूंजती रहती हैं। यह संग्रह आज भी उतना ही प्रासंगिक है—क्योंकि मनुष्य और उसकी नैतिक चुनौतियाँ समय से परे हैं।