नारी जीवन को रेवा के नीर में कल्पना करती मैं सुरेखा साधारण से जीवन को ग़ज़ल के रूप में गुनगुनाने का प्रयास है। अंधकार में कल्पना का प्रकाश है। साधारण तृण से हरित कुशा का नव आकार हैं। दोनों ही पक्षों में जीवन का संचार करती मां रेवा की धार है। अस्त होता हुआ सूरज कहीं और उदय होने का संदेश देता है। एक बंद मार्ग नव द्वार के खुल जाने का संदेश देता है। जीवन एक पाठशाला सुख और दुःख उसके दो शिक्षक जो बारी बारी से हमारे जीवन में आते हैं होते ही कालखंड पूर्ण लोट जातें हैं। मेरे विचारों की इस धार में कहीं न कहीं रेवा की धारा है। जिसे मेरी कल्पनाओं के माध्यम से आपके समक्ष रखने का प्रयास है।