भारतीय तथा पाश्चात्य दर्शन में निरीश्वरवाद (लेखक: वेद प्रकाश वर्मा)प्रस्तुत पुस्तक भारतीय एवं पाश्चात्य दर्शन की उन धाराओं का एक गंभीर एवं मौलिक अध्ययन है जो ईश्वर के अस्तित्व को नकारती हैं या उस पर संदेह करती हैं। इस पुस्तक का प्रमुख उद्देश्य प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक दोनों परंपराओं में विकसित निरीश्वरवादी विचारधाराओं का तुलनात्मक विवेचन करना है। लेखक ने इस दीर्घकालीन यात्रा को बड़ी ही सूक्ष्मता से समझा है। इसमें भारतीय सभ्यता के वैदिक काल (जहाँ से आस्तिक और नास्तिक दोनों परंपराओं का सूत्रपात हुआ) से लेकर पाश्चात्य सभ्यता के सुकरात-पूर्व युग (जहाँ तर्क और प्रकृति को केंद्र में रखने वाले चिंतक हुए) तथा बीसवीं शताब्दी के आधुनिक दर्शन तक की सभी प्रमुख निरीश्वरवादी विचारधाराओं को समाहित किया गया है।पुस्तक में चार्वाक दर्शन बौद्ध और जैन परंपराओं के निरीश्वरवादी पक्षों के साथ-साथ पाश्चात्य जगत के भौतिकवाद प्रत्यक्षवाद अस्तित्ववाद और मार्क्सवाद जैसे दर्शनों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। इस पुस्तक की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका तुलनात्मक दृष्टिकोण है। लेखक ने जहाँ भी संभव हुआ है यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि इन दो भिन्न सांस्कृतिक धरातलों पर विकसित निरीश्वरवादी सिद्धांतों में क्या समानताएँ और क्या मूलभूत अंतर हैं। यह तुलना पाठक को न केवल दोनों दर्शनों की गहरी समझ देती है बल्कि निरीश्वरवाद की सार्वभौमिक जड़ों को भी उजागर करती है। पुस्तक की भाषा सरल और बोधगम्य है जो इस जटिल विषय को विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए समान रूप से उपयोगी बनाती है।अधि-नीतिशास्त्र के मुख्य सिद्धांत (लेखक: वेद प्रकाश वर्मा)यह पुस्तक नैतिक दर्शन की एक अत्याधुनिक शाखा ''अधि-नीतिशास्त्र'' (मेटा-एथिक्स) पर केंद्रित है। यह विधा पारंपरिक नीतिशास्त्र से इस मायने में भिन्न है कि यह ''अच्छा क्या है'' यह बताने के बजाय यह प्रश्न उठाती है कि ''अच्छाई'' शब्द का अर्थ क्या है? यह नैतिकता की भाषा उसके तर्क और उसकी अवधारणाओं का विश्लेषण करती है। प्रस्तुत पुस्तक में इसी विषय के स्वरूप क्षेत्र तथा ऐतिहासिक विकास को विस्तार से समझाया गया है।पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह है कि इसमें अधि-नीतिशास्त्र के प्रमुख सिद्धांतों—जैसे प्रकृतिवाद निर्प्रकृतिवाद अलौकिक सत्ता संबंधी सिद्धांत संवेगवाद परामर्शवाद उचित तर्क संबंधी सिद्धांत और नव्य प्रकृतिवाद—का न केवल विस्तृत विवेचन किया गया है बल्कि उनका आलोचनात्मक मूल्यांकन भी किया गया है। इन सिद्धांतों की विवेचना के अतिरिक्त पुस्तक में तथ्यात्मक कथनों (जो है) से नैतिक निर्णयों (जो होना चाहिए) के निगमन की महत्वपूर्ण समस्या पर भी गहन विचार किया गया है। इस जटिल विषय को लेखक ने अत्यंत सरल और सहज भाषा-शैली में प्रस्तुत करके इसे पाठकों के लिए सुगम और बोधगम्य बना दिया है। यह पुस्तक विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में दर्शनशास्त्र के विद्यार्थियों एवं शिक्षकों के लिए एक अनमोल स्रोत सिद्ध होगी जो उन्हें नैतिकता की इस नवीन विधा से परिचित कराने में सहायक होगी।
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