भारत जैसे विकासशील लोकतांत्रिक देश में समाज कल्याण समाज सुधार सामाजिक न्याय तथा सामाजिक विकास किसी भी सरकार की प्राथमिकता के विषय होते है। संसाधनों की अल्पता अपर्याप्त प्रशासनिक अमला उपलब्ध कर्मचारियों की अरुचि नौकरशाही के दोष तथा भ्रष्टाचार आदि कारणों के चलते चाहते हुए भी अलग-अलग विचारधाराओं वाली विभिन्न सरकार अपने सामाजिक लक्ष्यों को प्राप्त कर पाने में पुरी तरह सफल नहीं हो सकी है। देश के कई हिस्सों में तो स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद भी विकास कार्य नहीं हुए है तो कई क्षेत्रों में इसकी स्थिति असंतुलित है। नागरिकों की आवश्यकताओं एवं शासन के मध्य एक अंतराल उत्पन्न होने लगा जिसका सिधा नकारात्मक प्रभाव आम लोगों के जीवन एवं स्वस्थ लोकतंत्र पर पड़ता दिखाई देने लगा। जन तथा तंत्र के मध्य अंतराल को पाटने के साथ एक सेतु के रुप में एक दूसरे से जोड़ने का काम स्वैच्छिक संगठनों ने किया है। अपनी इस भूमिका में यह संगठन सरकार के विकल्प या विरोधी के स्थान पर शासन के पूरक के रुप में दिखाई पड़ रहे है।किसी गांव-कस्बे की छोटी सी परिधि में अपने ध्येय की प्राप्ति में संलग्न स्थानीय संगठन हो अथवा वैश्विक स्तर पर अपना प्रसार रखने वाले अंतर्राष्ट्रीय स्तर के संगठन इन स्वैच्छिक संगठनों ने समाज में अपनी एक विशेष पहचान बनाई है। बात चाहे वैयक्तिक समायोजन की हो अथवा पारिवारिक समायोजन प्रदान करने की सामूहिक आधार पर आवश्यकताओं की पूर्ति की हो अथवा सामुदायिक जीवन को व्यवस्थित एवं संगठित करने की हो अथवा व्यक्तियों को अपनी एवं आश्रितों की आवश्यकताओं की पूर्ति स्वयं करने हेतु सक्षम बनाने एवं उन लाभार्थियों को संतोष एवं स्वतंत्रता का बोध करवाने की उन्हें स्थानीय स्तर पर न्यूनतम संसाधनों में अपने अप्रशिक्षित ध्येयनिष्ठ कार्यकर्ताओं के माध्यम से काम करने वाले संगठनों तथा साधन सम्पन्न विषय विशेषज्ञों एवं प्रशिक्षित पेशेवर कार्यकर्ताओं की बड़ी फौज के माध्यम से काम करने वाले बड़े राष्ट्रीय- अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के द्वारा सफलतम रुप से सतत् सेवाएं प्रदान कर रहे है।