महेन्द्र नेह जनवादी चेतना के विद्रोही और क्रान्तिधर्मी गीतकार व ग़ज़लकार हैं। उनका विद्रोह समाज में व्याप्त अन्याय अत्याचार अनाचार मूल्यहीनता राजनीतिक पाखंड तथा उपभोत्तफ़ावादी संस्कृति के विरुद्ध असहमति और अस्वीकृति है। महेन्द्र नेह की यह आजीवन अस्वीकृति जनांदोलनों के पक्ष में और सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध में सड़क पर उतर कर एक ‘एक्टिविस्ट’ रचनाकार के रूप में जानी जाती है। महेन्द्र पिछले साठ वर्षों से जनचेतना के लिए जन-गीत कविताएँ और जन-ग़ज़लों की रचना करते रहे हैं। उनकी ये ग़ज़लें भी किताब में आने से बहुत पहले जनता के दिलों में अपनी जगह बना चुकी हैं। इस तरह वे हिन्दी की जनपक्षधर कविता के अग्रणी रचनाकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुईं हैं। हिन्दी की चर्चित त्रैमासिक पत्रिका ‘अभिव्यत्तिक्त ’ का वे अनेक वर्षों से संपादन कर रहे हैं। महेन्द्र नेह का प्रथम ग़ज़ल संग्रह है जिसमें उनकी प्रतिनिधि ग़ज़लें शामिल हैं। उनकी ये ग़ज़लें जहाँ एक ओर अन्याय और शोषण के विरुद्ध आवाज बुलंद करती हैं वहीं समाज के रहनुमाओं और आकाओं को चेतावनी भी देती हैं। इस संग्रह की ग़ज़लों को पढ़ते हुए आज के विषम जीवन का सटीक और मार्मिक चित्र जैसे जीवंत हो जाता है।--हरेराम समीप