मेवात बोली के महाकवि सादल्लाह द्वारा रचित 'पंडून का कड़ा' महाभारत की कथा पर आधारित रचना है जिसे मेवात क्षेत्र में मीरासी ढोलक औफ सारंगी के साथ और आम कथावाचक बगैर संगीत के सामाजिक उत्सवों जैसे- शादी अकीका आदि अवसर पर गाकर सुनाते हैं। पूरी कथा दोहों व छंदों में लिखी गई है। कहते हैं मूल कथा में 1800 दोहे थे। मगर सन् 1947 के हंगामे में सादल्लाह के वंशजों ने मूल पाण्डुलिपि को अन्य दस्तावेजों के साथ कुएँ में फेंक दिया और मूल पाण्डुलिपि इस तरह नष्ट हो गई। मगर उस समय हजारों लोगों को यह कंठस्थ याद थी इसलिए कथा तो बच गई मगर इसके बहुत सारे दोहे छूट गये। कई स्थानों पर कथा की शैली में मामूली अंतर भी आ गया। इस समय इस कथा में सिर्फ 855 दोहे ही बचे जिन्हें विभिन्न सोर्सेस (sources) से हमने संकलित किया है।