तरसेम गुजराल बहुमुखी प्रतिभ संपन्न लेखक हैं। उनका मानना है कि कविता का जमीन से गहरा नाता है। जमीन पर हाशिये पर खड़े आदमी के आँसू गिरते हैं। जमीन पर सुख के क्षण ओस की तरह मोती बन चमकते हैं। विचारधारा के बिना कविता नहीं लिखी जाती। विचारधारा ही पत्थर में हीरा ढूंढ़ पाती है। उनकी गहरी इच्छा है कि गरीब वंचित शोषित जन कविता का हिस्सा बनें। उनके लिए सौन्दर्यबोध और प्रतिरोध अलग-अलग नहीं। कविता शोर मचाकर प्रतिरोध नहीं रचती उसका कागज पर आकार पाना भी प्रतिरोध है- उनकी कविता जीवन विवेक बन कर उभरी है। उनके लिए लाखों शुभकामनाएं!