जीवन एक बड़ी परीक्षा है ।यह परीक्षा कई स्तरों पर होती है । वास्तव में यह कारोबार मनुष्य में मौजूद क्षमताओं की परख का है । मनुष्यों द्वारा कुछ भी किये जाने के उनकी जिजीविषा है और इस बहाने से उनमें विद्यामान योग्ताओं का मूल्यांकन भी है ।अपने आप को परखने के लिए ही कोई कुछ भी करता ही है । या किन्हीं परिस्थितियों में उसकी परख हो जाती है । किसी भी मनुष्य के जीवन में यह होना अवश्यंभावी है । ''परख ''उपन्यास ऐसा ही ताना-बाना है । इस उपन्यास के नायक -नायिका परस्पर के हुए भी अंततः एक बड़ी परख से गुजरते हैं कि नायिका अपना अंदादान करके नायक को बचा लेने की परीक्षा से गुजरती है । हलाँकि उपन्यास के पूर्वार्ध में परिस्थितियों के निर्माण में सकारात्मकता के साथ उपस्थित नहीं भी रहती है । नायक अपनी युवावस्था में कविता प्रेम और स्त्री प्रेम से गुजरता है ।यह दूसरी तरह से भी हो सकता था । यह संभावना भी एक जगह बनती जरूर है । नहीं तो जीवन कटु अनुभव से बच गया होता । पर हुआ भी वही जो मंजूर -ए -खुदा था । क्योंकि गलत ठीक क की समझ के उम्र की अवस्था भी एक कारक होती है ।नियति के लिखे को टाला नहीं जा सकता ।अगर यह बात पूर्ण सत्य नहीं तो झूठ भी नहीं है । जब हम नियति की बात करते हैं तो हम यह कह सकते हैं कि किसी का भी विवाह नियति सम्मत है पर संबंध का विकास नियति की परख है । अर्थात दांपत्य जीवन इसी परख पर आधारित है।
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