पश्चिमी काव्यशास्त्र का आरम्भ चौथी पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व से ही हो जाता है। यूनान का एथेंस नगर पाश्चात्य कला संस्कृति और साहित्य का केन्द्र था। इस केन्द्र की संस्कृति विकसित होकर यूरोप के विभिन्न देशों में अपने ढंग से फलती-फूलती रही। काव्यशास्त्र का आदि प्रणेता प्लेटो था जो यूनान् का रहने वाला था। प्लेटो का शिष्य अरस्तू भी वहीं का निवासी था। काव्यशास्त्र की बहुत-सी बुनियादी बातें प्लेटो और अरस्तू के चिंतन में मिल जाती है। विचित्र बात तो यह है कि काव्यशास्त्र की परम्परा का विकास गुरु-शिष्य के मतभेदों में ही निहित था। प्लेटो की धारणा काव्य और कवियों के प्रति अच्छी नहीं थी। उसका मानना था कि काव्य वासना को सिंचित करता है। इसलिए उनके आदर्श गण-राज्य में कवियों के लिए कोई स्थान नहीं था। फिर भी उसके चिंतन के फलस्वरूप अनुकृक्ति-सिद्धांत प्रेरणा सिद्धांत आनंद-सिद्धांत और आवयविक अन्विति- सिद्धांत का प्रादुर्भाव हुआ। प्लेटो के शिष्य अरस्तू ने साहित्य-चिंतन को एक सुदृढ़ भूमि पर प्रतिष्ठित किया। प्लेटो की भांति अनुकृति-सिद्धांत उसे भी मान्य था किंतु अनुकृति में वह पुनः सृजन का नया अर्थ भर देता है। उसने काव्य की विभिन्न विधाओं का वर्गीकरण भी किया। किंतु उसके काव्यशास्त्र के कारण पाश्चात्य समीक्षाशास्त्र का मार्ग प्रशस्त हुआ। नैतिक्ता के आवरण को हटाकर विरेचन-सिद्धांत द्वारा उसने काव्यगत आनंद की पुष्टि भी की।
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