हित-वचन नहीं तूने माना मैत्री का मूल्य न पहचाना तो ले मैं भी अब जाता हूँ अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ। याचना नहीं अब रण होगा जीवन-जय या कि मरण होगा। ‘टकरायेंगे नक्षत्र-निकर बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर फण शेषनाग का डोलेगा विकराल काल मुँह खोलेगा। दुर्योधन! रण ऐसा होगा। फिर कभी नहीं जैसा होगा।