Pattharo ki Dhadkan (पत्थर की धड़कन)

About The Book

कविवर श्री आलोक अग्रवाल के इस कविता-संग्रह के दो खंड हैं। प्रथम खंड में सत्ताइस छोटी-बड़ी रचनाएं हैं और दूसरे खंड में तीन शीर्षकों के अन्तर्गत बीस छोटी-छोटी कविताएं तथा बत्तीस मुक्तक संग्रहीत हैं। इन रचनाओं में कवि अपने परिवेश और स्थितियों के प्रति चिन्तनशील है। शहरों में घटती हुई हरियाली बढ़ता प्रदूषण धरती का अनवरत दोहन विदेशी भाषा के प्रति मोह भौतिकता के अंधकार में खोता हुआ प्रेम का प्रकाश बढ़ती हुई प्रतिस्पर्धा और घटती हुई मानवता गिरते हुए जीवन-मूल्य मानवता-बनाम-दानवता आदि कवि के चिन्तन का विषय रहे हैं। 'जीवन के प्रति आस्था' का स्वर अन्त में फिर उभरा है और पाठकों के चिन्तन के लिए अनेक प्रश्न छोड़ गया है। संग्रह की एक रचना 'गुमनामी' में कवि की अस्मिता की तड़प की अभिव्यक्ति है। अपनी रचना के समादर के लिए कवि शंकालु है और विशाल काव्य-जगत में एक अंश-मात्र स्थान की कामना करता है। संग्रह के अंत में कवि के गंभीर चिन्तन के कुछ कण संग्रहीत हैं जो मनन के विषय हैं।
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