भास्कर कविश के उपन्यास ''पेंसिल चोर'' में अभ्युदय का वो सफ़र है जिसमें नास्तिकता और आस्तिकता एक ही सड़क पर खड़े हैं। पेंटर गुरु और उनकी माई का अपना अलग नज़रिया है अपना अलग दार्शनिक ''एंगल'' है अभ्युदय की माँ का अपना अलग उसकी पत्नी अनुभूति का अपना अलग। इन सबके केंद्र में है अभ्युदय; अभ्युदय के केंद्र में ऐसे दुख ऐसे सपने ऐसी तड़प जिसे न वो किसी को बता पाया है और ना ही भुला पाया है। ये सफ़र है उन्हीं दुखों और सपनों की तड़प का दर्शनों के टकराव का उनके समावेश का प्रेम और अवसाद का अतीत की याद का एक पेंसिल की चोरी का ओर उस चोरी के बाद का। अभ्युदय ने जो पेंसिल अपने सपने पूरे करने के लिए चुरायी वही पेंसिल उसके सपने का गला भेदती चली गई। यह उपन्यास हर उस पेंसिल चोर की कहानी है जिन्हें उनके सपने एक शॉपनर की तरह छीलते रहे हैं। ''पेंसिल चोर'' भास्कर कविश का पहला उपन्यास है। आमतौर पर अपनी कविताओं एवं क्षणिकाओं के लिए मशहूर भास्कर कविश एक कविता संग्रह की बजाय उपन्यास लाने का कारण पूछने पर कहते हैं कि - अगर अभ्युदय की माँ और पेंटर गुरु जैसे किरदार न मिले होते तो शायद पेंसिल चोर का जन्म भी असंभव था; क्योंकि मेरा मानना है हर वह रचना जो केवल काग़ज़ भरने के लिए रची जाए एक पाप है। कलम को काग़ज़ छूने का अधिकार तभी है जब कुछ कहना वास्तव में अनिवार्य हो जाए।
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